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याज्ञवल्क्य • अध्याय 1 • श्लोक 13
ईश्वरो जीवकलया प्रविष्टो भगवानिति । प्रणमेद्दण्डवद्भूमावाश्वचण्डालगोखरम् ॥
(आत्म-तत्त्वज्ञ तो किसी व्यक्ति विशेष को भी प्रणाम नहीं करता अथवा फिर) ईश्वर को यह समझकर कि वह जीव के रूप में इस संसार के समस्त प्राणियों में स्थित है, घोड़े, चाण्डाल, गौ तथा गधे आदि सभी को दण्डवत् प्रणाम करता है।
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