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याज्ञवल्क्य • अध्याय 1 • श्लोक 12
नामादिभ्यः परे भूम्नि स्वाराज्ये चेत्स्थितोऽद्वये । प्रणमेत्कं तदात्मज्ञो न कार्यं कर्मणा तदा॥
नाम, धाम, काम एवं अवस्था आदि से परे, ऊँचे श्रेष्ठ स्थान पर प्रतिष्ठित, अद्वय रूप स्वाराज्य में (जिसमें अपने से भिन्न कुछ भी दृष्टिगोचर नहीं होता) स्थित, स्थिर मति, आत्म तत्त्व में निष्णात संन्यासी भला कैसे किसी को प्रणाम करे; क्योंकि वह तो सभी में अपना ही रूप देखता है। उसके लिए तो कोई भी कार्य संसार में शेष नहीं रहता।
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