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याज्ञवल्क्य • अध्याय 1 • श्लोक 11
प्रमादिनो बहिश्चित्तिाः पिशुनाः कलहोत्सुकाः । संन्यासिनोऽपि दृश्यन्ते वेदसंदूषिताशयाः ॥
प्रमादि, बहिर्मुखी, विषयों में आसक्त रहने वाले, नीच, कलह प्रिय एवं वेद के आशय (विचार) को दोषपूर्ण प्रतिपादित करने वाले संन्यासी भी देखने में आते हैं।
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