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याज्ञवल्क्य • अध्याय 1 • श्लोक 10
यो भवेत्पूर्वसंन्यासी तुल्यो वै धर्मतो यदि । तस्मै प्रणामः कर्तव्यो नेतराय कदाचन ॥
जिस मनुष्य ने अपने से पूर्व (पहले ही) संन्यास ग्रहण कर लिया हो अथवा जो धर्म तुल्य हो अर्थात् आचार-विचार एवं सम्प्रदाय से जो श्रेष्ठ हो, उसे ही प्रणाम करना चाहिए, किसी अन्य को नहीं।
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