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विज्ञान भैरव • अध्याय 1 • श्लोक 91
वणस्य सविसर्गस्य विसर्गान्तं चितिं कुरु | निराधारेण चित्तेन स्पृरोद्रह्य सनातनम्‌ ॥
जब मन विसर्ग से जुड़ जाता है तो विसर्ग के अंत में वह आधारहीन हो जाता है। इस प्रकार मन शाश्वत ब्रह्म या सर्वोच्च चेतना से स्पर्श हो जाता है।
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