वायुद्वयस्य सम्घट्राद् अन्तर् वा बहिरन्ततः |
योगी समत्वविज्ञानसमुद्रमनभाजनम् ॥
शरीर के अंदर या बाहर दोनों वायु (प्राण और अपान) के संलयन से, योगी संतुलन प्राप्त करता है और चेतना की उचित अभिव्यक्ति के लिए उपयुक्त हो जाता है।
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