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विज्ञान भैरव • अध्याय 1 • श्लोक 53
एवम्‌ एव जगत्सवं दग्धं घ्यात्वा विकल्पतः | अनन्यचेतसः पुम्सः पुम्भावः परमो भवेत्‌ ॥
इसी प्रकार (कालाग्नि द्वारा) जलते हुए समस्त ब्रह्माण्ड का अविचल और एकाग्र मन से ध्यान करने पर वह मनुष्य धर्मात्मा बन जाता है या मनुष्यत्व की सर्वोच्च अवस्था प्राप्त कर लेता है।
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