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विज्ञान भैरव • अध्याय 1 • श्लोक 43
निजदेहे सवेदिक्षम्‌ युगपद्धावयेद्धियत्‌ | निर्विकल्पमनास्तस्य वियत्सर्वम्‌ प्रवर्तते ॥
सभी दिशाओं का एक साथ अपने ही शरीर में स्थान या शून्य के रूप में चिंतन करना चाहिए। मन भी समस्त विचारों से मुक्त होकर (चेतना के शून्य स्थान में) विलीन हो जाता है।
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