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विज्ञान भैरव • अध्याय 1 • श्लोक 29
उद्च्छन्तीं तदिद्रूपाम प्रतिचक्रं कमात्कमम्‌ | ऊर्घ्वं मुष्टित्रयं यावत्‌ तावद्न्त महोदयः ॥
उस शक्ति का ध्यान करें जो बिजली की तरह एक-एक करके सभी चक्रों से होते हुए द्वादशान्त तक ऊपर की ओर बढ़ती है। फिर अंत में भैरव के गौरवशाली रूप का उदय होता है।
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