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विज्ञान भैरव • अध्याय 1 • श्लोक 152
स्वतन््रानन्दाचन्मात्रसारः स्वात्मा हि सवतः | आवेशनं तत्स्वरूपे स्वात्मनः स्नानमीरितम्‌ ॥
व्यक्ति का स्वयं का स्वरूप वास्तव में स्वतंत्रता का सर्वव्यापी आनंद और चेतना का सार है। स्वयं की उस प्रकृति या स्वरूप में लीन हो जाना ही वास्तविक स्नान (शुद्धिकरण) कहा जाता है।
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