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विज्ञान भैरव • अध्याय 1 • श्लोक 146
ध्यानं हि निश्चला बुद्धिनिराकारा निराश्रया | न तु ध्यानं शरीराक्षिमुखहस्तादिकल्पना ॥
जब बुद्धि स्थिर, निराकार और बिना किसी सहारे के हो जाती है, तब ध्यान सिद्ध होता है। शरीर, आँख, मुँह, हाथ आदि से परमात्मा के स्वरूप की कल्पना करना ध्यान नहीं है।
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