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विज्ञान भैरव • अध्याय 1 • श्लोक 129
यत्र यत्र मनो याति तत्तत्‌ तेनैव तत्क्षणम्‌ | परित्यज्यानवस्थित्या निस्तरङ्गस्ततो भवेत्‌ ॥
मन जहां भी रहता है, उसी क्षण उसे त्यागकर मन आधारहीन और अशांति से मुक्त हो जाता है।
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