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विज्ञान भैरव • अध्याय 1 • श्लोक 127
यदवेद्यं यदग्राह्यं यच्छून्य॑ यदभावगम्‌ | तत्सवं भरव भाव्य तदन्तं बाघस्म्भवः ॥
जो कुछ भी शून्य है और जिसे जाना, समझा या कल्पना नहीं किया जा सकता, उस सब के रूप में भैरव का चिंतन करने से अंत में अनुभूति होती है।
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