समः शत्रो च मित्रे च समो मानावमानयोः ॥
ब्रह्मणः पस्पूणत्वादात ज्ञात्वा सुखी भवत् ॥
जो मनुष्य मित्र और शत्रु, मान और अपमान में कोई भेद नहीं करता, ब्रह्म को अपने आप में पूर्ण (सर्वव्यापी) जानता है, वह परम सुखी होता है।
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