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विज्ञान भैरव • अध्याय 1 • श्लोक 100
चिद्धमां सवंदेहेषु विषो नास्ति कुत्रचित्‌ | तश्च तन्सय स्वं भावयन्भवाजजनः ॥
वह (भैरव) सभी मूर्त रूपों में अविभाज्य चेतना की प्रकृति का है। इसलिए, जो व्यक्ति उस चेतना से व्याप्त समस्त सृष्टि पर चिंतन करते हैं, वे सापेक्ष अस्तित्व से परे हो जाते हैं।
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