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विदुर नीति • अध्याय 1 • श्लोक 88
षण्णामात्मनि नित्यानामैश्वर्यं योऽधिगच्छति । न स पापैः कुतोऽनर्थैर्युज्यते विजितेन्द्रियः ॥
मन में नित्य रहने वाले छः शत्रु - काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद तथा मात्सर्य कों जो वश में कर लेता है, वह जितेन्द्रिय पुरुष पापों से ही लिप्त नहीं होता, फिर उनसे उत्पन्न होने वाले अनर्थों की तो बात ही क्या है।
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