अरक्षितारं राजानं भार्यां चाप्रिय वादिनीम् ।
ग्रामकारं च गोपालं वनकामं च नापितम् ॥
जैसे उपदेश न देने वाले आचार्य, मन्त्रोच्चारण न करनेवाले होता, रक्षा करने में असमर्थ राजा, कटु वचन बोलने वाली स्त्री, ग्राम में रहने की इच्छावाले ग्वाले तथा बन में रहने की इच्छा वाले नाई - इन छःको उसी भाँति छोड़ दे, जैसे समुद्र की सैर करने वाला मनुष्य, फटी हुई नाव का परित्याग कर देता है ।
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