भक्तं च बजमानं च तवास्मीति वादिनम् ।
त्रीनेतान् शरणं प्राप्तान्विषमेऽपि न सन्त्यजेत् ॥
भक्त, सेवक तथा मैं आपका ही हूँ, ऐसा कहने वाले, इन तीन प्रकार के शरणागत मनुष्यों को संकट पड़ने पर भी नहीं छोड़ना चाहिये।
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