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विदुर नीति • अध्याय 1 • श्लोक 7
वैशंपायन उवाच । ततः प्रविश्य विदुरो धृतराष्ट्र निवेशनम् । अब्रवीत्प्राञ्जलिर्वाक्यं चिन्तयानं नराधिपम् ॥
वैशम्पायन जी कहते हैं - तदनन्तर विदुर धृतराष्ट्र के महल के भीतर जाकर चिन्ता में पड़े हुए राजा से हाथ जोड़कर बोले -
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