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विदुर नीति • अध्याय 1 • श्लोक 39
संसारयति कृत्यानि सर्वत्र विचिकित्सते । चिरं करोति क्षिप्रार्थे स मूढो भरतर्षभ ॥
भरतश्रेष्ठ! जो अपने कामों को व्यर्थ ही फैलाता है, सर्वत्र सन्देह करता है, तथा शीघ्र होने वाले काम में भी देर लगाता है, वह मूढ़ है।
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