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विदुर नीति • अध्याय 1 • श्लोक 31
न हृष्यत्यात्मसंमाने नावमानेन तप्यते । गाङ्गो ह्रद इवाक्षोभ्यो यः स पण्डित उच्यते ॥
जो अपना आदर होने पर हर्ष के मारे फूल नहीं उठता, अनादर से संतप्त नहीं होता, तथा गङ्गाजी के कुण्ड के समान, जिसके चित्त को क्षोभ नहीं होता, वह पण्डित कहलाता है।
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