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विदुर नीति • अध्याय 1 • श्लोक 22
क्रोधो हर्षश्च दर्पश्च ह्रीस्तम्भो मान्यमानिता । यमर्थान्नापकर्षन्ति स वै पण्डित उच्यते ॥
क्रोध, हर्ष, गर्व, लज्जा, उद्दप्डता तथा अपने को पूज्य समझना - ये भाव जिसको पुरुषार्थ से भ्रष्ट नहीं करते, वही पण्डित कहलाता है।
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