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विदुर नीति • अध्याय 1 • श्लोक 20
आत्मज्ञानं समारंभस्तितिक्षा धर्मनित्यता । यमर्थान्नापकर्षन्ति स वै पण्दित उच्यते ॥
अपने वास्तविक स्वरूप का ज्ञान, उद्योग, दुख सहने की शक्ति, और धर्म में स्थिरता - ये गुण जिस मनुष्य को पुरुषार्थ से च्युत नहीं करते, वही पण्डित कहलाता है।
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