धृतराष्ट्र उवाच ।
श्रोतुमिच्छामि ते धर्म्यं परं नैःश्रेयसं वचः ।
अस्मिन्राजर्षिवंशे हि त्वमेकः प्राज्ञसंमतः ॥
धृतराष्ट्र ने कहा - मैं तुम्हारे धर्मयुक्त तथा कल्याण करने वाले सुन्दर वचन सुनना चाहता हूँ, क्योंकि इस राजर्षि वंश में केवल तुम्हीं विद्वानों के भी माननीय हो।
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