चिकीर्षितं विप्रकृतं च यस्य नान्ये जनाः कर्म जानन्ति किं चित् ।
मन्त्रे गुप्ते सम्यगनुष्ठिते च स्वल्पो नास्य व्यथते कश्चिदर्थः ॥
जिसके अपनी इच्छा के अनुकूल, और दूसरों की इच्छा के विरुद्ध कार्य को दूसरे लोग कुछ भी नहीं जान पाते, मन्त्र गुप्त रहने और अभीष्ट कार्य का ठीक-ठीक सम्पादन होने के कारण, उसका थोड़ा भी काम बिगड़ने नहीं पाता।
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