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विदुर नीति • अध्याय 1 • श्लोक 115
न योऽभ्यसूयत्यनुकम्पते च न दुर्बलः प्रातिभाव्यं करोति । नात्याह किं चित्क्षमते विवादं सर्वत्र तादृग्लभते प्रशंसाम् ॥
बिवेक नहीं खो बैठता, दूसरों के दोष नहीं देखता, सब पर दया करता है, दुर्बल होते हुए किसी की जमानत नहीं देता, बढ़कर नहीं बोलता, तथा विवाद को सह लेता है, ऐसा मनुष्य सब जगह प्रशंसा पाता है।
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