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विदुर नीति • अध्याय 1 • श्लोक 114
न संरम्भेणारभतेऽर्थवर्गम् आकारितः शंसति तथ्यमेव । न मात्रार्थे रोचयते विवादं नापूजितः कुप्यति चाप्यमूढः ॥
जो क्रोध या उतावली के साथ धर्म, अर्थ तथा कामका आरम्भ नहीं करता, पूछने पर यथार्थ बात ही बतलाता है, मित्र के लिये झगड़ा नहीं पसन्द करता, आदर न पानेपर क्रुद्ध नहीं होता,
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