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विदुर नीति • अध्याय 1 • श्लोक 103
समये च प्रियालापः स्वयूथेषु च संनतिः । अभिप्रेतस्य लाभश्च पूजा च जनसंसदि ॥
समय पर प्रिय वचन बोलना, अपने वर्ग के लोगों में उन्नति, अभीष्ट वस्तु की प्राप्ति, और जन समाज में सम्मान।
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