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वाक्य वृत्ति • अध्याय 1 • श्लोक 51
प्रारब्धकर्मवेगेण जीवन्मुक्तो यदा भवेत्। किञ्चित्कालमनारब्धकर्मबन्धस्य संक्षये।।
जब प्रारब्ध कर्म के वेग से जीव जीवन्मुक्त होता है, तब कुछ समय तक अनारब्ध कर्म (जिनका फल अभी प्रारम्भ नहीं हुआ) के बन्धन का क्षय होने तक स्थिति बनी रहती है।
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