जब प्रारब्ध कर्म के वेग से जीव जीवन्मुक्त होता है, तब कुछ समय तक अनारब्ध कर्म(जिनका फल अभी प्रारम्भ नहीं हुआ) के बन्धन का क्षय होने तक स्थिति बनी रहती है।
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