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वाक्य वृत्ति • अध्याय 1 • श्लोक 50
विशीर्णकार्यकरणो भूतसूक्ष्मैरनावृतः। विमुक्तकर्मनिगलः सद्य एव विमुच्यते।।
जिसके कार्य-करण (स्थूल और सूक्ष्म देह-इन्द्रिय-मन) विलीन हो चुके हैं, जो भूतसूक्ष्मों (सूक्ष्म तत्त्वों) से आवृत नहीं है, और जो कर्म-बन्धन (कर्मों की बेड़ियों) से मुक्त है, वह उसी क्षण सद्योमुक्ति (तत्काल मुक्ति) को प्राप्त करता है।
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