जब तक “अहं ब्रह्मास्मि” का वाक्यार्थ-बोध दृढ़ न हो जाए, तब तक शम आदि साधनों(मन-निग्रह आदि) के साथ श्रवण, मनन और निदिध्यासन का अभ्यास करते रहना चाहिए।
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