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वाक्य वृत्ति • अध्याय 1 • श्लोक 48
अहं ब्रह्मेति वाक्यार्थबोधो यावद्दृढीभवेत्। शमादिसहितस्तावदभ्यस्येच्छ्रवणादिकम्।।
जब तक “अहं ब्रह्मास्मि” का वाक्यार्थ-बोध दृढ़ न हो जाए, तब तक शम आदि साधनों (मन-निग्रह आदि) के साथ श्रवण, मनन और निदिध्यासन का अभ्यास करते रहना चाहिए।
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