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वाक्य वृत्ति • अध्याय 1 • श्लोक 44
आलम्बनतया भाति योऽस्मत्प्रत्ययशब्दयोः। अन्तःकरणसंभिन्नबोधः स त्वंपदाभिधः।।
'वह जो चमकता है, विचार की वस्तु और 'मैं' शब्द के रूप में, आंतरिक उपकरणों में व्यक्त चेतना है। यह 'तुम' (त्वम्) का सीधा शब्द-अर्थ है।
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