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वाक्य वृत्ति • अध्याय 1 • श्लोक 4
अनायासेन येनास्मान्मुच्येय भवबन्धनात्। तन्मे संक्षिप्य भगवन्केवलं कृपया वद।।
हे भगवन्, कृपया मुझे संक्षेप में वह बताइए जिसके द्वारा हम बिना प्रयास के इस भवबन्धन (संसार के बंधन) से मुक्त हो जाएँ।
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