मुख्य पृष्ठ शास्त्र परिचय ऐप इंस्टॉल करें
वाक्य वृत्ति • अध्याय 1 • श्लोक 39
इत्थमन्योन्यतादात्म्यप्रतिपत्तिर्यदा भवेत्। अब्रह्मत्वं त्वमर्थस्य व्यावर्तेत तदैव हि।।
जब इस प्रकार परस्पर तादात्म्य (एकत्व) का बोध हो जाता है, तब “त्वम्” पद में जो अब्रह्मत्व (ब्रह्म से भिन्नता) की कल्पना है, वह स्वयं ही निवृत्त हो जाती है।
पूरा ग्रंथ पढ़ें
वाक्य वृत्ति के सभी अध्याय और श्लोकों को उनके अर्थ और व्याख्या सहित पढ़ने के लिए Krishjan ऐप इंस्टॉल करें। ऐप में आपको संरचित अध्याय, आसान नेविगेशन और ऑफलाइन पढ़ने की सुविधा मिलती है।

सभी अध्याय उपलब्ध

वाक्य वृत्ति के 18 अध्याय और सभी श्लोक एक ही स्थान पर।

सरल अर्थ

प्रत्येक श्लोक के साथ स्पष्ट हिंदी अनुवाद।

ऑफलाइन पढ़ें

इंटरनेट के बिना भी ग्रंथ पढ़ें।
Krishjan
धर्म का अन्वेषण
ऐप इंस्टॉल करें