जो प्रत्यग्बोध(अन्तर्मुख चैतन्य ज्ञान) के रूप में प्रकट होता है, वही अद्वय आनन्द(द्वैत-रहित सुख) का स्वरूप है। और वही अद्वय आनन्द(अद्वितीय सुख) स्वरूप भी प्रत्यग्बोध(अन्तरात्म-चेतना) के ही लक्षण वाला है।
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