संसर्गो वा विशिष्टो वा वाक्यार्थो नात्र संमतः।
अखण्डैकरसत्वेन वाक्यार्थो विदुषां मतः।।
यहाँ वाक्यार्थ को संसर्ग(केवल संबंध) या विशिष्टता(विशेषण-विशेष्य भाव) के रूप में स्वीकार नहीं किया गया है। विद्वानों के मत में वाक्यार्थ अखण्ड एकरसता(अविभाज्य एकत्व) के रूप में है।
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