मुख्य पृष्ठ शास्त्र परिचय ऐप इंस्टॉल करें
वाक्य वृत्ति • अध्याय 1 • श्लोक 37
संसर्गो वा विशिष्टो वा वाक्यार्थो नात्र संमतः। अखण्डैकरसत्वेन वाक्यार्थो विदुषां मतः।।
यहाँ वाक्यार्थ को संसर्ग (केवल संबंध) या विशिष्टता (विशेषण-विशेष्य भाव) के रूप में स्वीकार नहीं किया गया है। विद्वानों के मत में वाक्यार्थ अखण्ड एकरसता (अविभाज्य एकत्व) के रूप में है।
पूरा ग्रंथ पढ़ें
वाक्य वृत्ति के सभी अध्याय और श्लोकों को उनके अर्थ और व्याख्या सहित पढ़ने के लिए Krishjan ऐप इंस्टॉल करें। ऐप में आपको संरचित अध्याय, आसान नेविगेशन और ऑफलाइन पढ़ने की सुविधा मिलती है।

सभी अध्याय उपलब्ध

वाक्य वृत्ति के 18 अध्याय और सभी श्लोक एक ही स्थान पर।

सरल अर्थ

प्रत्येक श्लोक के साथ स्पष्ट हिंदी अनुवाद।

ऑफलाइन पढ़ें

इंटरनेट के बिना भी ग्रंथ पढ़ें।
Krishjan
धर्म का अन्वेषण
ऐप इंस्टॉल करें