इस प्रकार “त्वम्” पद के अर्थ को निश्चित कर, पुनः “तत्” पद के अर्थ का चिंतन करो — अतद्-व्यावृत्ति(जो नहीं है उसका निषेध) के रूप में तथा साक्षात् विधि(प्रत्यक्ष सकारात्मक बोध) के रूप में भी।
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