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वाक्य वृत्ति • अध्याय 1 • श्लोक 20
अजडात्मवदाभान्ति यत्सांनिध्याज्जडा अपि। देहेन्द्रियमनःप्राणाः सोऽहमित्यवधारय।।
जिसकी सन्निधि से जड़ होने पर भी देह, इन्द्रिय, मन और प्राण ऐसे प्रतीत होते हैं जैसे वे चेतन हों, वह ही “मैं हूँ” — ऐसा निश्चय करो।
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