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वाक्य वृत्ति • अध्याय 1 • श्लोक 2
यस्य प्रसादादहमेव विष्णुर्मय्येव सर्वं परिकल्पितं च। इत्थं विजानामि सदात्मरूपं तस्याङ्घ्रिपद्मं प्रणतोऽस्मि नित्यम्।।
जिनकी कृपा से मैं स्वयं विष्णु हूँ और मुझमें ही यह सम्पूर्ण जगत कल्पित है, इस प्रकार मैं उस सदात्मस्वरूप (सत्य-चैतन्य स्वरूप) को जानता हूँ; मैं उनके चरणकमलों को सदा प्रणाम करता हूँ।
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