संघातोऽपि तथा नाहमिति दृश्यविलक्षणम्।
द्रष्टारमनुमानेन निपुणं संप्रधारय।।
इसी प्रकार यह संघात(देह-इन्द्रिय-मन का समूह) भी मैं नहीं हूँ, क्योंकि यह दृश्य है और द्रष्टा से भिन्न है। इसलिए तर्क और अनुमान के द्वारा इस भेद को भली-भाँति निश्चित करो कि द्रष्टा ही वास्तविक स्वरूप है।
पूरा ग्रंथ पढ़ें
वाक्य वृत्ति के सभी अध्याय और श्लोकों को उनके अर्थ और व्याख्या सहित पढ़ने के लिए Krishjan ऐप इंस्टॉल करें। ऐप में आपको संरचित अध्याय, आसान नेविगेशन और ऑफलाइन पढ़ने की सुविधा मिलती है।
सभी अध्याय उपलब्ध
वाक्य वृत्ति के 18 अध्याय और सभी श्लोक एक ही स्थान पर।