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वाक्य वृत्ति • अध्याय 1 • श्लोक 17
संघातोऽपि तथा नाहमिति दृश्यविलक्षणम्। द्रष्टारमनुमानेन निपुणं संप्रधारय।।
इसी प्रकार यह संघात (देह-इन्द्रिय-मन का समूह) भी मैं नहीं हूँ, क्योंकि यह दृश्य है और द्रष्टा से भिन्न है। इसलिए तर्क और अनुमान के द्वारा इस भेद को भली-भाँति निश्चित करो कि द्रष्टा ही वास्तविक स्वरूप है।
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