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वाक्य वृत्ति • अध्याय 1 • श्लोक 13
रूपादिमान्यतः पिण्डस्ततो नात्मा घटादिवत्। वियदादिमहाभूतविकारत्वाच्च कुम्भवत्।।
क्योंकि यह देह रूप आदि गुणों से युक्त पिण्ड है, इसलिए यह आत्मा नहीं है, जैसे घट आदि जड़ वस्तुएँ आत्मा नहीं होतीं। यह आकाश आदि महाभूतों के विकार से उत्पन्न होने के कारण भी कुम्भ के समान जड़ एवं परिवर्तनशील है।
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