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वैराग्य शतकम् • अध्याय 1 • श्लोक 99
धन्यानां गिरिकन्दरे निवसतां ज्योतिः परं ध्यायतां- आनन्दाश्रुजलं पिबन्ति शकुना निःशङ्कमङ्केशयाः ।। अस्माकं तु मनोरथोपरचितप्रासादवापीतट- क्रीडाकाननकेलिकौतुकजुषामायुः परिक्षीयते ।।
वे धन्य हैं, जो पर्वतों की गुफाओं में रहते हैं और परब्रह्म की ज्योति का ध्यान करते हैं, जिनके आनन्दाश्रुओं को उनकी गोद में बैठे हुए पक्षी निर्भयता से पीते हैं। हमारी ज़िन्दगी तो मनोरथों के महल की बावड़ी के किनारे के क्रीड़ा-स्थान में लीलाएं करते हुए ही वृथा बीतती है।
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