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वैराग्य शतकम् • अध्याय 1 • श्लोक 98
भोगा भंगुरवृत्तयो बहुविधास्तैरेव चायं भवः तत्कस्यैव कृते परिभ्रमतरे लोका कृतं चेष्टितैः । आशापाशशतोपशान्तिविशदं चेतः समाधीयतां कामोच्छित्तिवशे स्वधामनि यदि श्रद्धेयमस्मद्वचः ।।
नाना प्रकार के विषय भोग नाशमान और संसार-बन्धन के कारण हैं, इस बात को जानकार भी मनुष्यों! उनके चक्कर में क्यों पड़ते हो? इस चेष्टा से क्या लाभ होगा? अगर आपको हमारी बात का विश्वास हो, तो आप अनेक प्रकार के आशा-जाल के टूटने से शुद्ध हुए चित्त को सदा कामनाशक स्वयंप्रकाश शिवजी के चरण में लगाओ। (अथवा अपनी इच्छाओं के समूल नाश के लिए, अपने ही आत्मा के ध्यान में मग्न हो जाओ।
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