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वैराग्य शतकम् • अध्याय 1 • श्लोक 97
कौपीनं शतखण्डजर्ज्जरतरं कन्था पुनस्तादृशी निश्चिन्तम् सुखसाध्यभैक्ष्यमशनं शय्या श्मशाने वने । मित्रामित्र समानताऽतिविमला चिन्ताऽथशून्यालये ध्वस्ता शेषमदप्रमाद मुदितो योगी सुखं तिष्ठति ।।
वही योगी सुखी है, जो एकदम से फटी-पुरानी सैकड़ो चीथड़ों से बनी कोपीन पहनता है और वैसी ही गुदड़ी ओढ़ता है, जिसके पास चिन्ता नहीं फटकती, जो सुख से मिला हुआ भिक्षान्न खाता है, जो श्मशान भूमि या वन में सो रहता है, जो मित्र और शत्रुओं को समान समझता है, जो सूनी झोंपड़ी में ध्यान करता है और जिसके मद और प्रमाद सम्पूर्ण रूप से नष्ट हो गए हैं।
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