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वैराग्य शतकम् • अध्याय 1 • श्लोक 96
रे कंदर्प करं कदर्थयसि किं कोदण्डटंकारितैः। रे रे कोकिल कोमलैः किं त्वं वृथाजल्पसि ।। मुग्धे स्निग्धविदग्धमुग्धमधुरैर्लोलैः कटाक्षैरलं चेतश्चुम्बितचन्द्रचूड़चरणध्यानमृतं वर्त्तते ।।
हे कामदेव! तू धनुष्टङ्कार सुनाने के लिए क्यों बारबार हाथ उठाता है? हे कोकिला! तू मीठी-मीठी सुहावनी आवाज़ में क्यों कुहू-कुहू करती है? ए मूर्ख स्त्री! तू अपने मनोमोहक मधुर कटाक्ष मुझ पर क्यों चलाती है? अब तुम मेरा कुछ नहीं कर सकते; क्योंकि अब मेरे चित्त ने शिव के चरण चूमकर अमृत पी लिया है।
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