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वैराग्य शतकम् • अध्याय 1 • श्लोक 94
प्रिय सखि विपद्दण्डव्रतप्रताप परम्परा- तिपरिचपले चिन्ताचक्रे निधाय विधिः खलः ।। मृदमिव बलात्पिण्डीकृत्य प्रगल्भकुलालवद्- भ्रमयति मनो नो जानीमः किमत्र विधास्यति ।।
हे प्यारी सखी बुद्धि! कुम्हार जिस तरह गीली मिटटी के लौंदे को चाक पर चढ़कर डंडे से चाक को बारम्बार घुमाता है और उससे इच्छानुसार बर्तन तैयार करता है; उसी तरह संसार को गढ़नेवाला ब्रह्मा हमारे चित्त को चिन्ता के चाक पर चढ़ा कर, विपत्तियों के डंडे से चाक को लगातार घुमाता हुआ, हमारा क्या करना चाहता है, यह हमारी समझ में नहीं आता?
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