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वैराग्य शतकम् • अध्याय 1 • श्लोक 93
शय्या शैलशिला गृहं गिरिगुहा वस्त्रं तरुणं त्वचः सारंगाः सुहृदो ननु क्षितिरुहां वृत्तिः फलैः कमलैः ।। येषां निर्झरम्बुपानमुचितं रत्येव विद्याङ्गना मन्ये ते परमेश्वराः शिरसि यैर्बद्धो न सेवांजलिः।।
मैं उनको परमेश्वर समझता हूँ, जो किसी के सामने मस्तक नहीं नवाते, जो पर्वत की शिला को ही अपनी शय्या समझते हैं, जो गुफा को ही अपना घर मानते हैं, जो वृक्षों की छालों को ही अपने वस्त्र और जंगली हिरणो को ही अपने मित्र समझते हैं, वृक्षों के कोमल फलों से ही उदार की अग्नि को शान्त करते हैं, जो कुदरती झरनो का जल पीते हैं और जो विद्या को ही अपनी प्राण प्यारी समझते हैं।
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