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वैराग्य शतकम् • अध्याय 1 • श्लोक 92
स्नात्वा गाङ्गैः पयोभिः शुचिकुसुमफलैरर्चयित्वा विभो त्वां ध्येये ध्यानं नियोज्य क्षितिधरकुहरग्रावपर्येकमूले । आत्मारामः फलाशी गुरुवचनरतस्त्वत्प्रसादात्स्मरारे दुःखं मोक्ष्ये कदाहं तब चरणरतो ध्यानमार्गैकनिष्ठ ।।
हे शिव! हे कामारि! गंगा स्नान करके तुझ पर पवित्र फल-फूल चढ़ाता हुआ, तेरी पूजा करता हुआ, पर्वत की गुफा में शिला पर बैठा हुआ, अपने ही आत्मा में मग्न होता हुआ, वन-फल खाता हुआ, गुरु की आज्ञानुसार तेरे ही चरणों का ध्यान करता हुआ कब मैं इन संसारी दुखों से छुटकारा पाउँगा?
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