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वैराग्य शतकम् • अध्याय 1 • श्लोक 91
तृषा शुष्यत्यास्ये पिबति सलिलं स्वादु सुरभि क्षुधार्तः सञ्शालीन्कवलयति शाकादिवाळितां । प्रदीप्ते कामाग्नौ सुदृढतरमाश्लिष्यति वधूं प्रतीकारो व्याधेः सुखमिति विपर्यस्यति जनः ।।
जब मनुष्य का कण्ठ प्यास से सूखने लगता है, तब वह शीतल जल पीता है; जब उसे भूख लगती है, तब वह साग और कढ़ी प्रभृति के संग चावल खाता है; जब उसकी कामाग्नि तेज़ होती है तब वह स्त्री को ज़ोर से गले लगाता है; विचार कर देखने से मालूम होता है, कि ये सब बिमारियों की एक-एक दवा है; परन्तु लोग इन्हे भूल से सुख समान मानते हैं।
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