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वैराग्य शतकम् • अध्याय 1 • श्लोक 90
जीर्णा एव मनोरथाः स्वहृदये यातं च जरां यौवनं हन्ताङ्गेषु गुणाश्च वन्ध्यफलतां याता गुणज्ञैर्विना । किं युक्तं सहसाऽभ्युपैति बलवान्कालः कृतान्तोऽक्षमी ह्याज्ञातंस्मरशासनाङ्घ्रियुगलं मुक्त्वाऽस्तिनान्यागतिः ।।
हमारी इच्छाएं हमारे ह्रदय में ही जीर्ण हो गईं, जवानी भी चली गयी, हमारे अच्छे-अच्छे गुण भी कदरदानों के न होने से बेकार हो गए, सर्वशक्तिमान, सर्वनाशक काल (मृत्यु) शीघ्र-शीघ्र हमारे पास आ रहा है; इसलिए अब हमारी समझ में कामारि शिव के चरणों के सिवा और जगह हमारी रक्षा नहीं है।
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